(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.197. अध्यायः 197
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
स्कन्देन देवादीन्प्रति धर्मरहस्यविशेषकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

[स्कन्द उवाच।

ममाप्यनुमतो धर्मस्तं शृणुध्वं समाहिताः।
नीलषण्डस्य शृङ्गाभ्यां गृहीत्वा मृत्तिकां तु यः॥ 13-197-1(89078)
अभिषेकं त्र्यहं कुर्यात्तस्य धर्मं निबोधत।
शोधयेदशुभं सर्वमाधिपत्यं परत्र च॥ 13-197-2(89079)
यावच्च जायते मर्त्यस्तावच्छूरो भविष्यति।
इदं चाप्यपरं गुह्यं सरहस्यं निबोधत॥ 13-197-3(89080)
प्रगृह्यौदुम्बरं पात्रं पक्वान्नं मधुना सह।
सोमस्योत्तिष्ठमानस्यि पौर्णमास्यां बलिं हरेत्॥ 13-197-4(89081)
तस्य धर्मफलं नित्यं श्रद्दधाना निबोधत।
साध्या रुद्रास्तथाऽऽदित्या विश्वेदेवास्तथाऽश्विनौ 13-197-5(89082)
मरुतो वसवश्चैव प्रतिगृह्णन्ति तं बलिम्।
सोमश्च वर्धते तेन समुद्रश्च महोदधिः॥ 13-197-6(89083)
एष धर्मो मयोद्दिष्टः सरहस्यः सुखावहः॥ 13-197-7(89084)
विष्णुरुवाच। 13-197-8x(7433)
धर्मगुह्यानि सर्वाणि देवतानां महात्मनाम्।
ऋषीणां चैव गुह्यानि यः पठेदाह्निकं सदा॥ 13-197-8(89085)
शृणुयाद्वाऽनसूयुर्यः श्रद्दधानः समाहितः।
नास्य विघ्नः प्रभवति भयं चास्य न विद्यते॥ 13-197-9(89086)
ये च धर्माः शुभाः पुण्याः सरहस्या उदाहृताः।
तेषां धर्मफलं तस्य यः पठेत जितेन्द्रियः॥ 13-197-10(89087)
नास्य पापं प्रभवति न च पापेन लिप्यते।
पठेद्वा श्रावयेद्वाऽपि श्रुत्वा वा लभते फलम्॥ 13-197-11(89088)
भुञ्जते पितरो देवा हव्यं कव्यमथाक्षयम्।
श्रावयंश्चापि विप्रेन्द्रान्पर्वसु प्रयतो नरः॥ 13-197-12(89089)
ऋषीणां देवतानां च पितॄणां चैव नित्यदा।
भवत्यभिमतः श्रीमान्धर्मेषु प्रयतः सदा॥ 13-197-13(89090)
कृत्वाऽपि पापकं कर्म महापातकवर्जितम्।
रहस्यधर्मं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ 13-197-14(89091)
भीष्म उवाच। 13-197-15x(7434)
एतद्धर्मरहस्यं वै देवतानां नराधिप।
व्यासोद्दिष्टं मया प्रोक्तं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ 13-197-15(89092)
पृथिवी रत्नसंपूर्णा ज्ञानं चेदमनुत्तमम्।
इदमेव ततः श्राव्यमिति मन्येत धर्मवित्॥ 13-197-16(89093)
नाश्रद्दधानाय न नास्तिकाय
न नष्टधर्मायि न निर्घृणाय।
न हेतुदुष्टाय गुरुद्विषे वा
नानात्मभूताय निवेद्यमेतत्॥ ॥ 13-197-17(89094)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 197 ॥


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